जय दुर्गे दुर्गति परिहारिणि

भगवान शंकराचार्य जी ‘देव्यपराधक्षमापन’ स्तोत्र में माँ से निरन्तर कृपानुभूति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए और अपनी असमर्थता पर पश्चात्ताप करते हुए कहते है –

जगन्मातर्र्मातस्तव चरणसेवा न रचिता,
न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया।
तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे,
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति।।

– हे जगन्माता! मैंने तेरे चरणों की सेवा नहीं की, न ही मैंने कभी तुझे कोई वस्तु प्रदान की। तथापि तुम मुझे सदा स्नेह करती रही। इसीलिए तो शक्तिमयी माँ दुर्गा जगदम्बा हैं, जगज्जननी हैं। वे अपनी सन्तानों से सदा निष्कारण प्रेम करती हैं, अपनी स्नेह-सरिता में सर्वदा अवगाहन कराती हैं, अपने प्रेम-जलधर की वृष्टि से सिंचित करती हैं, अपने स्नेहांचल में सुलाकर त्राण करती हैं और सदा-सर्वदा अर्हिनश मंगल करती रहती हैं। पिता की पुत्र से बहुत अपेक्षाएँ होती हैं। पिता पुत्र को कई कसौटियों पर खरा देखना चाहते हैं। किन्तु माँ तो माँ होती है। उसकी पुत्र से कोई अपेक्षा-आकांक्षा नहीं होती, वह तो बस अपनी सन्तान से प्रेम के लिए प्रेम करती है। भगवान की परीक्षा में यदि भगवान स्वयं कृपा कर उत्तीर्ण न करें, तो भक्त सफल नहीं हो सकता। इसलिए माँ अपने पुत्रों की बहुत परीक्षा नहीं लेती, वह तो चाहती है कि उसका पुत्र एक बार मुझे अपनी माँ कह दे, अपनी माँ का बोध कर मेरे पास आ जाय। लेकिन दुर्भाग्यवशात् हम ऐसी दयामयी माता के चरणारविन्दों को छोड़कर संसार के क्षणभंगुर विषय-कमल-कलिका को पकड़ने का प्रयत्न करते हैं, जो स्पर्श करते ही नष्ट हो जाती है और मनुष्य को दुख-सागर में डुबा देती है। इसलिए भक्त अपने अपराधों का प्रायश्चित्त करते हुए माँ से प्रार्थना करता है –

अपराध सहस्राणि क्रियन्तेऽर्हिनशं मया।
दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वरी।।

– हे माँ! मुझ से दिन-रात हजारों अपराध हो रहे हैं, किन्तु अपना सेवक समझकर मुझे क्षमा कर दो –

अपराध सहस्रों निशदिन होते मेरे द्वारा।
हे परमेश्वरी दास मानकर क्षम अपराध हमारा।।
भक्ति-क्रिया से हीन सुरेश्वरि मन्त्र न मुझको आता।
यथाशक्ति पूजा की तेरी उससे खुश हो माता।।
अपराधी हूँ हे माता इसलिये शरण आया तेरी।
कृपापात्र हूँ माँ मेरी, कर जैसी इच्छ हो तेरी।।
अज्ञान विस्मरण भ्रान्ति से जो थोड़ा-बहु पाप किया।
उन सबको कर क्षमा देवि दरशन दे हे शिवप्रिया।।
कामेश्वरि जगन्माता सच्चिदानन्दस्वरूपिणि हो।
प्रेम-अर्चना से प्रसन्न हो, माँ तुम ही परमेश्वरी हो।।

माँ दुर्गा की पूजा बड़े व्यापक रूप से भारत और भारतेतर भारतवासियों के द्वारा बड़ी श्रद्धा-भक्ति से मनाई जाती है। सर्वदुखहारिणी, सर्वसुखकारिणी, दयारूपिणी, वात्सल्यप्रर्विषणी माँ दुर्गा संसार की सभी चराचर प्राणियों की माता हैं। वे सन्तानों की सदा-सर्वदा रक्षा करने के लिये उद्यत एवं उत्सुक रहती हैं। सन्तानों के शत्रुओं के विनाशार्थ सौम्यरूपिणी माँ जगदम्बा रौद्ररूपिणी बन जाती हैं। देवों के अरि दानवों के वध हेतु हाथ में बरछी लेकर रौद्र रूप धारण कर दानवों से युद्ध करने लगती हैं और उन दैत्यों का विनाश कर देवों को अभय प्रदान करती हैं। इसीलिये माँ दुर्गा के नाम की बड़ी महिमा बताई गयी है –

दुर्गे दुर्गेति दुर्गाया दुर्गे नाम परं हितम्।
यो भजेत् सततं चण्डीं जीवन्मुक्त: स मानव:।।

– यह दुर्गा नाम मानवों के लिए परमहितैषी है। जो व्यक्ति इन नामों का भजन करता है, वह जीवन्मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करता है। माँ दुर्गा के नाम-जप की ऐसी महिमा है। भयग्रस्त मानवों को भयमुक्त करने हेतु माँ दुर्गा के कुछ नामों के जप का उल्लेख मिलता है। माँ दुर्गा के ३२ नामों के पाठ मात्र से मानव सभी भयों से मुक्त हो जाता है। उनमें से कुछ नाम बड़े महत्त्वपूर्ण हैं जैसे — दुर्गार्तिशमनी, दुर्गनाशिनी, दुर्गमासुरसहंत्री, दुर्गेश्वरी आदि। माँ दुर्गा जन्म-मरण-चक्र रूपी दुर्गनाशिनी हैं, आर्तों की पीड़ा का शमन करती हैं, कठिन, दुर्गम दुर्ग का भेदन करने वाली हैं, दुर्दैत्यों का संहार करनेवाली और सबकी परमेश्वरी हैं। जीवन में दुख-संकट भय आने पर माँ की इन नामों से आराधना, उपासना करने से अतुलनीय शक्ति का उद्भव होता है और मनुष्य उन समस्त संकटों को हँसते हुए पार हो जाता है।

महाशक्तिशालिनी हैं माँ दुर्गा

माँ के नाम-स्मरण मात्र से मानव के तन-मन में शक्ति आती है। ऐसा क्यों न हो? क्योंकि माँ दुर्गा महाशक्तिशालिनी हैं। माँ का प्राकट्य समस्त देवताओं के एक-एक अंश से उद्भूत शक्ति के सम्मिलन से हुआ है। अत: सर्वदेवशक्ति की सम्मिलित महाशक्ति हैं। देवासुर संग्राम में देव पराजित होकर दानवों से रक्षा हेतु माँ से प्रार्थना करते हैं, तब महाशक्तिरूपिणी माँ शुम्भ-निशुम्भ आदि दैत्यों का वध कर विजय प्राप्त करती हैं और देवों को सनाथ करती हैं। माँ दुर्गा को जब-जब देवों ने आर्त होकर पुकारा, तब-तब माँ ने आकर उनकी रक्षा की। माँ ने स्वयं यह प्रतिज्ञा की है –

इत्थं यदा यदा बाधा दानवोत्था भविष्यति।
तदा तदावतीर्याहं करिष्याम्यरिसंक्षयम्।।

– इस प्रकार जब-जब संसार में दानवी बाधा उपस्थित होगी, तब-तब अवतार लेकर मैं शत्रुओं का संहार करूँगी। इतना ही नहीं माँ देवताओं को आश्वस्त करते हुए कहती हैं —

एभि: स्तवैश्च मां नित्यं स्तोष्यते य: समाहित:।
तस्याहं सकलां बाधां नाशयिष्याम्यसंशयम्।।…
उपसर्गानशेषांस्तु महामारी समुद्भवान्।
तथा त्रिविधमुत्पातं माहात्म्यं शमयेन्मम।।

– जो एकाग्रचित्त होकर प्रतिदिन इन स्तुतियों से मेरा स्तवन करेगा, उसकी सारी बाधाएँ मैं निश्चय दूर करूँगी। जो मेरा माहात्म्य सुनेगा, उसके महामारीजनित सभी दुखों और त्रिविध दुखों का मैं शमन कर दूँगी। तभी तो स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती जी महाराज भव-भय नाश हेतु माँ दुर्गा की वन्दना करते हैं –
जय दुर्गे दुर्गति परिहारिणी शुम्भ विदारिणी मातु भवानी।।
आदिशक्ति परब्रह्मस्वरूपिणी जगजननि चहुँ वेद बखानी।।
ब्रह्मानन्द शरण में आये भवभय नाश करो महरानी।।

माँ के प्रति प्रेम कैसे बढ़े?

माता के उपकारों को स्मरण करने से उनके प्रति प्रेम बढ़ता है। त्रैलोक्यनाथ सान्याल कहते हैं —

अन्तरे जागिछो गो माँ अन्तरयामिनी।
कोले कोरो आछो मोरे दिवस यामिनी।।…

– अर्थात् ‘‘हे अन्तर्यामिनी माँ! तुम मेरे हृदय में जाग्रत हो। मुझे अर्हिनश अपनी गोद में ली हुई हो। हे माँ! इस अधम पुत्र के प्रति तुम्हारा इतना स्नेह! मानो तुम प्रेम में पगली हो गई हो। माँ! तुम कभी प्रेम से और कभी बलपूर्वक मुझे अमृत पिलाती हो और मधुर कहानियाँ सुनाती हो। मैं अब तेरी वाणी को सुनकर ही सन्मार्ग पर चलूँगा। तेरा दुग्ध पीकर वीर बलवान बनूँगा और आनन्द से जय ब्रह्म सनातनी के गीत गाऊँगा।’’ इस प्रकार माँ जगदम्बा की कृपा का अनुभव करने से, मन-ही-मन उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने से उनसे प्रेम और श्रद्धा बढ़ती है। इसी प्रेम और श्रद्धा की डोर से आकर्षित होकर माँ पुत्र को अपना दिव्य दर्शन देने और उसकी रक्षा करने के लिये दौड़ी चली आती हैं। माँ जगदम्बा सर्वरूपमयी हैं और सकल संसार देवीमय, देवी से परिपूर्ण है, इसलिये मैं उस विश्वरूपिणी परमेश्वरी को नमस्कार करता हूँ।

सर्वरूपमयी देवि सर्वं देवीमयं जगत्।
अतोऽहं विश्वरूपां त्वां नमामि परमेश्वरीम्।।

ऐसी परम सहृदया स्नेहवत्सला सुत-स्नेह में पागलिनी हमारी माँ दुर्गा हैं। माँ हम सबका परम कल्याण करें और अपना दिव्य दर्शन देकर हम सबको भवसागर से पार करें।

लेखक: स्वामी प्रपत्त्यानन्द1

  1. विवेक ज्योति, अक्टूबर 2016

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