१६. सात्त्विक सुख, शान्ति और आनन्दमें क्या फर्क है?
चिन्मयताके सम्बन्धसे (कीर्तन आदिमें) ‘सात्त्विक सुख’ मिलता है। सात्त्विक सुखका भोग न करनेसे ‘शान्ति’ मिलती है। शान्तिका भी उपभोग न करनेसे ‘आनन्द’ मिलता है। सात्त्विक सुखमें गुण हैं, शान्ति और आनन्द गुणातीत हैं।संसारके त्यागसे शान्ति और परमात्माकी प्राप्तिसे आनन्द मिलता है॥१६॥

१७. सांसारिक सुख और पारमार्थिक आनन्दमें क्या अन्तर है?
सांसारिक सुख दुःखकी अपेक्षासे हैं अर्थात् सांसारिक सुखके साथ दुःख भी है। परन्तु आनन्द निरपेक्ष है, उसके साथ दुःखका मिश्रण नहीं है। सांसारिक सुखमें विकार है, पर आनन्द निर्विकार है। सांसारिक सुख विषयेन्द्रिय-संयोगजन्य है, पर आनन्द संयोगजन्य नहीं है। अत: सांसारिक सुखमें तो भभका है, पर आनन्दमें भभका नहीं है, प्रत्युत वह सम, एकरस, शान्त, निर्विकार है। तात्पर्य है कि विकार, दुःख, परिवर्तन, कमी, हलचल, विक्षेप, विषमता, पक्षपात आदिका न होना ही ‘आनन्द’ है। आनन्द दो प्रकारका होता है, अखण्ड आनन्द (निजानन्द) और अनन्त आनन्द (परमानन्द)। मुक्तिका आनन्द ‘अखण्ड आनन्द’ और प्रेमका आनन्द ‘अनन्त आनन्द’ है। अखण्ड आनन्द सम, शान्त, एकरस रहता है और अनन्त आनन्द प्रतिक्षण वर्धमान होता है। अत: प्रेमका आनन्द मुक्तिके आनन्दसे वहुत विलक्षण है। मुक्तिमें तो केवल सांसारिक दुःख मिटता है और स्वयं वैसा-का-वैसा रहता है, पर प्रेममें स्वयंका अपने अंशी परमात्माकी ओर खिंचाव होता है। यदि साधक अपना आग्रह न रखे तो शान्तरस अखण्डरसमें और अखण्डरस अनन्तरसमें स्वत: लीन होता है॥१७॥

२०. कर्तव्यका पालन कठिन क्यों दीखता है?
कर्तव्य कहते ही उसे हैं, जिसे किया जा सके और जिसे करना चाहिये। जिसे नहीं कर सकते, वह कर्तव्य नहीं होता। अत: कर्तव्यका पालन सवसे सुगम है। अकर्तव्यकी आसक्तिके कारण ही कर्तव्य-पालन कठिन दीखता है॥२०॥

११०. क्रोध आनेपर क्या करना चाहिये?
चुप हो जाना चाहिये। वोलनेसे क्रोध बढ़ता है, चुप होनेसे क्रोध शान्त होता है। यदि बोले बिना रहा न जाय तो मुखमें ठण्डा जल भर ले और उसको कुछ देरतक मुखमें ही रखकर फिर धीरे-धीरे पी जाय। जलसे क्रोधरूपी अग्नि शान्त होती है। मूलमें क्रोध अहंकार और कामनासे पैदा होता है— ‘कामात्क्रोधोऽभिजायते’ (गीता २ । ६२)। जब अभिमानरूपी फोड़ेमें ठेस लगती है अथवा मनके विरुद्ध कोई बात होती है, तब क्रोध आता है। इसलिये अहंकार और कामनाका त्याग करना चाहिये। शरीर संसारका है और मैं भगवान्का हूँ। मैं शरीरसे सर्वथा अलग हूँ। इस प्रकार विवेककी प्रधानता होनेसे क्रोध नहीं आता। बड़ोंपर क्रोध आये तो उनके चरणोंमें गिर जाना चाहिये कि मुझे क्रोध आ गया ! सत्संग करनेसे स्वभाव सुधरता है और काम-क्रोधादि दोष कम होते हैं॥११०॥

१११. कामवृत्तिका नाश कैसे हो?
शरीरके साथ अपना सम्बन्ध माननेसे ही काम-वृत्ति पैदा होती है। हमारा स्वरूप सत्तामात्र है। सत्तामात्रकी तरफ वृत्ति रहनेसे कामवृत्तिका नाश हो जाता है। कारण कि सत्तामें विकार नहीं है और विकारमें सत्ता नहीं है। विचार करनेसे अथवा भगवान्से प्रार्थना करनेसे भी ‘काम’ से बचा जा सकता है। दृढ़ निश्चयसे भी ‘काम’ दूर जो जाता है; जैसे—पहले जमानेमें राजालोग ही नहीं, डाकू भी स्त्रियोंसे दुर्व्यवहार नहीं करते थे तो यह उनका दृढ़ निश्चय था। ‘काम’ नीरसतासे पैदा होता है। जैसे कुत्तेको मांस नहीं मिलता तो वह सूखी हड्डी ही चबाता है, जिससे उसके मुखसे खून निकलता है और वह उसीसे राजी हो जाता है ! ऐसे ही नीरसतामें मनुष्य देखता है कि कोई भी भोग मिल जाय तो थोड़ा सुख ले लें ! यदि भगवान्में प्रियता हो जाय तो नीरसता दूर हो जायगी और नीरसता दूर होनेसे ‘काम’ भी नहीं रहेगा॥१११॥

११७. धर्मका मूल क्या है?
स्वार्थका त्याग तथा दूसरोंका हित॥११७॥

११८. धर्मका प्रचार कैसे करें?
धर्मके अनुसार खुद चलें—इसके समान धर्मका प्रचार कोई नहीं है॥११८॥

२९९. विवेक किस उपायसे बढ़ता है?
अगर मनुष्य विवेकका आदर करे अर्थात् विवेक-विरुद्ध कार्य न करे तो उसका विवेक गुरु आदिकी सहायताके बिना स्वत: वढ़ जाता है। अगर वह जान-बूझकर न करनेलायक काम करेगा तो विवेक नहीं बढ़ेगा। विवेक-विरुद्ध कार्य करनेसे विवेकका बढ़ना रुक जाता है॥२९१॥

३१९. संसारका असर न पड़े-इसके लिये क्या करें?
संसारका असर मन-बुद्धि-इन्द्रियोंपर पड़ता है, अपनेपर नहीं—इस तरफ खयाल रखें। संसारका असर सदा रहेगा नहीं, मिट जायगा, इसलिये इसकी परवाह न करें। मैं अससे अलग हूँ—इस तरफ दृष्टि रखें तो उसकी जड़ कट जायगी। हम परमात्माके अंश हैं, इसलिये हमारा सम्बन्ध परमात्माके साथ है। संसारमें कोई भी वस्तु व्यक्तिगत नहीं है। शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि प्रकृतिके अंश हैं, इसलिये उनका सम्बन्ध प्रकृतिके साथ है, हमारे साथ नहीं॥३११॥

३२४. संसारका खिंचाव मिटानेका बढ़िया उपाय क्या है?
विषयोंका सेवन रागपूर्वक न करे, पर भजन रागपूर्वक (प्रेमपूर्वक) करे। विषयोंका सेवन करते समय, भोग भोगते समय हृदयको कठोर रखे अर्थात् भोगोंमें रस न ले, उनसे निर्लिप्त रहे। कारण कि जैसे पिघले हुए मोममें रंग डालनेसे रंग उसके भीतर बैठ जाता है, ऐसे ही हृदय द्रवित होनेपर वे विषय भीतर वैठ जाते हैं॥३२४॥

३४८. साधकका कर्तव्य क्या है?
साधकका कर्तव्य है—साध्यसे प्रेम करना और असाधनका त्याग करना। चाह-रहित होना साधन है और किसीसे कुछ भी चाहना असाधन है॥३४८॥

३४९. साधक अपनी लगन (भूख) कैसे बढ़ाये?
लगन विचारसे बढ़ती है। विचार करना चाहिये कि नाशवान् पदार्थोके साथ हम कबतक रहेंगे? ये वस्तुएँ और व्यक्ति हमारे साथ कबतक रहेंगे? इसी चालसे साधन चलेगा तो सिद्धि कव होगी? अबतक जितने समयमें जितना लाभ हुआ है, उसी गतिसे साधन करनेपर और कितना समय लगेगा? आगे जीवनका क्या भरोसा है? आदि-आदि॥३४९॥

३५०. साधकको विशेष ध्यान किसपर देना चाहिये, असाधनको हटानेपर अथवा जप, ध्यान आदि साधन करनेपर?
असाधनको हटानेपर विशेष ध्यान देना चाहिये। असाधन है—नाशवान्‌का सम्बन्ध। जप, ध्यान आदि साधन करनेसे साधक सन्तोष कर लेता है कि मैने इतना जप कर लिया, इतना ध्यान कर लिया, आदि। यह सन्तोष साधकके लिये वाधक होता है॥३५०॥

३५५. मनुष्यजीवनमें साधनका आरम्भ कबसे होता है?
जब मनुष्य संसारसे संतप्त हो जाता है और विचार करता है, तब साधन आरम्भ होता है। तात्पर्य है कि जव मनुष्यको संसारसे सुख नहीं मिलता, शान्ति नहीं मिलती, तव वह संसारसे निराश हो जाता है। उसके भीतर उथल-पुथल मचती है और यह विचार होता है कि मुझे वह सुख चाहिये, जिसमें दुःख न हो। वह जीवन चाहिये, जिसमें मृत्यु न हो। वह पद चाहिये, जिसमें पतन न हो। मैं नित्य सुखके विना नहीं रह सकता। ऐसा विचार होनेपर वह साधनमें लग जाता है॥३५५॥

३५६. हमारा साधन आगे बढ़ रहा है या नहीं, इसकी पहचान कैसे करें?
जितना संसारमें आकर्षण कम हुआ है और भगवान्में आकर्पण अधिक हुआ है, उतना ही हम साधनमें आगे वढ़े हैं। साधनमें आगे बढ़नेपर व्यवहारमें राग-द्वेष कम होते हैं। चित्तमें शान्ति, प्रसन्नता रहती है। सांसारिक लाभ-हानिमें हर्ष-शोक कम होते हैं॥३५६॥

३८०. महान् सुख मिले बिना अल्प सुखकी आसक्तिका त्याग कैसे होगा?
इसका उपाय है कि पारमार्थिक विपयम थोड़ा भी सुख मिले तो उसका आदर करे, उसपर विश्वास करे। जैसे सत्संग, कथा-कीर्तन आदिमें एक सुख मिलता है, जबकि वहाँ कोई भोग-पदार्थ नहीं होता, पर हम उसका आदर नहीं करते। अगर पारमार्थिक विषयमें थोड़ा भी सुख मिले और उसपर हम विश्वास करते रहें तथा सांसारिक सुखका विश्वास छोड़ते जायँ तो महान् सुखका अनुभव हो जायगा। वास्तवमें हमें न अल्प सुख लेना है, न महान् सुख लेना है ! लेना कुछ है ही नहीं !॥३८०॥

३८४. भोगोंके पुराने संस्कार पुन: भोगोंमें लगाते हैं, ऐसी स्थितिमें साधक क्या करे?
पुराने संस्कार इतने बाधक नहीं हैं, जितनी सुखलोलुपता बाधक है। सुखलोलुपता होनेसे ही संस्कार बाधक होते हैं। हम पुराने संस्कारोंसे सुख तो लेते हैं और चाहते हैँ कि संस्कार न आयें, तभी संस्कार हमें बाध्य करते हैं। अगर उनसे सुख न लें तो संस्कार मिट जायँगे, बाध्य नहीं करेंगे। कारण कि वास्तवमें संस्कारकी सत्ता ही नहीं है। उसको हम ही सत्ता देते हैं—भोगके समय भी हम ही भोगको सत्ता देते हैं। भोगोंसे सुख लेते हैं—इसीपर भोग टिके हैं। सुख न लें तो भोग हो ही नहीं सकता। सुख न लें तो विना मिटाये भोगका संस्कार स्वत: कमजोर पड़ जायगा। सुख लेनेसे पुराना संस्कार (नया भोग भोगनेके समान) नया होता रहता है। पुराने संस्कार आयें तो साधक उनकी उपेक्षा कर दे, न विरोध करे, न अनुमोदन करे। असत्का संस्कार भी असत् ही होता है। असत्की सत्ता है ही नहीं— ‘नासतो विद्यते भाव:’ (गीता २ । १६)॥३८४॥

३८५. निषिद्ध भोगकी आसक्तिसे कैसे छूटा जाय?
निषिद्ध भोगकी आसक्ति खराव स्वभावके कारण होती है। स्वभाव सुधरता है—सत्संग, सद्विचार, सच्छास्त्रके द्वारा विवेक जाग्रत् होनेपर अथवा भगवान्के शरणागत होनेपर। याद करनेसे पुराना भोग नया होता रहता है। याद करनेसे नया भोग भोगनेकी तरह ही अनर्थ होता है। कोई भोग भोगे साठ वर्ष हो गये, पर आज उसको याद किया तो आज नया भोग हो गया ! मनुष्य पुराने भोगको याद करके उसको नया करता रहता है, इसीलिये उसकी आसक्ति मिटती नहीं। इसलिये अगर पुराना भोग याद आ जाय तो उसमें रस (सुख) न ले। रस लेनेसे वह नया हो जाता है, उसको सत्ता मिल जाती है॥३८५॥

३८७. देशकी सेवा बड़ी है या माता-पिताकी सेवा?
माता-पिताकी सेवा एक नम्बरमें है और देशकी सेवा दो नम्बरमें। कारण कि हमें माता-पिताने शरीर दिया है, उसका पालन पोषण किया है, पढ़ा-लिखाकर योग्य वनाया है, इसलिये उनका हमारेपर ऋण है। पहले ऋण चुकाना चाहिये, फिर देशसेवा, दान आदि करना चाहिये। ऋण चुकाये बिना दान आदि करनेका अधिकार ही नहीं है॥३८७॥

३९०. सेवाधर्मको कठोर क्यों कहा गया है—‘सब तें सेवक धरमु कठोरा’(मानस, अयोध्या० २०३ । ४)?
सुख-आराममें आसक्ति होनेसे ही सेवा कठिन दीखती है— ‘सेवक सुख चह मान भिखारी’ (मानस, अरण्य० १७ । ८)। अपने सुख-आरामका त्याग करें तो सेवा कठिन नहीं है; क्योंकि सेवा करनेकी सव सामग्री संसारकी ही है, अपनी नहीं। उस सामग्रीको अपने सुखमें लगानेसे सेवा नहीं होती॥३९०॥

४१४. समाज-सुधारका उपाय क्या है?
अपने सुधारसे स्वतः समाज-सुधार होता है; क्योंकि व्यक्ति भी समाजका ही अंग है। व्यक्तिगत जीवन तो ठीक न हो, पर बातें बढ़िया कहें तो न अपना सुधार होगा, न समाजका। वेश्या यदि पातिव्रत्यका उपदेश दे तो वह कैसे लगेगा? अतः बातें बढ़िया नहीं, अपना जीवन बढ़िया होना चाहिये। समाज-सुधारकी चेष्टा न करके अपने सुधारकी चेष्टा करनी चाहिये। अपना सुधार होगा—स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके दूसरेका हित करनेसे॥४१४॥

श्रोत: प्रश्नोत्तरमणिमाला, स्वामी रामसुखदास

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भगवान शंकराचार्य जी ‘देव्यपराधक्षमापन’ स्तोत्र में माँ से निरन्तर कृपानुभूति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए और अपनी असमर्थता पर पश्चात्ताप करते हुए कहते है –

जगन्मातर्र्मातस्तव चरणसेवा न रचिता,
न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया।
तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे,
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति।।

– हे जगन्माता! मैंने तेरे चरणों की सेवा नहीं की, न ही मैंने कभी तुझे कोई वस्तु प्रदान की। तथापि तुम मुझे सदा स्नेह करती रही। इसीलिए तो शक्तिमयी माँ दुर्गा जगदम्बा हैं, जगज्जननी हैं। वे अपनी सन्तानों से सदा निष्कारण प्रेम करती हैं, अपनी स्नेह-सरिता में सर्वदा अवगाहन कराती हैं, अपने प्रेम-जलधर की वृष्टि से सिंचित करती हैं, अपने स्नेहांचल में सुलाकर त्राण करती हैं और सदा-सर्वदा अर्हिनश मंगल करती रहती हैं। पिता की पुत्र से बहुत अपेक्षाएँ होती हैं। पिता पुत्र को कई कसौटियों पर खरा देखना चाहते हैं। किन्तु माँ तो माँ होती है। उसकी पुत्र से कोई अपेक्षा-आकांक्षा नहीं होती, वह तो बस अपनी सन्तान से प्रेम के लिए प्रेम करती है। भगवान की परीक्षा में यदि भगवान स्वयं कृपा कर उत्तीर्ण न करें, तो भक्त सफल नहीं हो सकता। इसलिए माँ अपने पुत्रों की बहुत परीक्षा नहीं लेती, वह तो चाहती है कि उसका पुत्र एक बार मुझे अपनी माँ कह दे, अपनी माँ का बोध कर मेरे पास आ जाय। लेकिन दुर्भाग्यवशात् हम ऐसी दयामयी माता के चरणारविन्दों को छोड़कर संसार के क्षणभंगुर विषय-कमल-कलिका को पकड़ने का प्रयत्न करते हैं, जो स्पर्श करते ही नष्ट हो जाती है और मनुष्य को दुख-सागर में डुबा देती है। इसलिए भक्त अपने अपराधों का प्रायश्चित्त करते हुए माँ से प्रार्थना करता है –

अपराध सहस्राणि क्रियन्तेऽर्हिनशं मया।
दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वरी।।

– हे माँ! मुझ से दिन-रात हजारों अपराध हो रहे हैं, किन्तु अपना सेवक समझकर मुझे क्षमा कर दो –

अपराध सहस्रों निशदिन होते मेरे द्वारा।
हे परमेश्वरी दास मानकर क्षम अपराध हमारा।।
भक्ति-क्रिया से हीन सुरेश्वरि मन्त्र न मुझको आता।
यथाशक्ति पूजा की तेरी उससे खुश हो माता।।
अपराधी हूँ हे माता इसलिये शरण आया तेरी।
कृपापात्र हूँ माँ मेरी, कर जैसी इच्छ हो तेरी।।
अज्ञान विस्मरण भ्रान्ति से जो थोड़ा-बहु पाप किया।
उन सबको कर क्षमा देवि दरशन दे हे शिवप्रिया।।
कामेश्वरि जगन्माता सच्चिदानन्दस्वरूपिणि हो।
प्रेम-अर्चना से प्रसन्न हो, माँ तुम ही परमेश्वरी हो।।

माँ दुर्गा की पूजा बड़े व्यापक रूप से भारत और भारतेतर भारतवासियों के द्वारा बड़ी श्रद्धा-भक्ति से मनाई जाती है। सर्वदुखहारिणी, सर्वसुखकारिणी, दयारूपिणी, वात्सल्यप्रर्विषणी माँ दुर्गा संसार की सभी चराचर प्राणियों की माता हैं। वे सन्तानों की सदा-सर्वदा रक्षा करने के लिये उद्यत एवं उत्सुक रहती हैं। सन्तानों के शत्रुओं के विनाशार्थ सौम्यरूपिणी माँ जगदम्बा रौद्ररूपिणी बन जाती हैं। देवों के अरि दानवों के वध हेतु हाथ में बरछी लेकर रौद्र रूप धारण कर दानवों से युद्ध करने लगती हैं और उन दैत्यों का विनाश कर देवों को अभय प्रदान करती हैं। इसीलिये माँ दुर्गा के नाम की बड़ी महिमा बताई गयी है –

दुर्गे दुर्गेति दुर्गाया दुर्गे नाम परं हितम्।
यो भजेत् सततं चण्डीं जीवन्मुक्त: स मानव:।।

– यह दुर्गा नाम मानवों के लिए परमहितैषी है। जो व्यक्ति इन नामों का भजन करता है, वह जीवन्मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करता है। माँ दुर्गा के नाम-जप की ऐसी महिमा है। भयग्रस्त मानवों को भयमुक्त करने हेतु माँ दुर्गा के कुछ नामों के जप का उल्लेख मिलता है। माँ दुर्गा के ३२ नामों के पाठ मात्र से मानव सभी भयों से मुक्त हो जाता है। उनमें से कुछ नाम बड़े महत्त्वपूर्ण हैं जैसे — दुर्गार्तिशमनी, दुर्गनाशिनी, दुर्गमासुरसहंत्री, दुर्गेश्वरी आदि। माँ दुर्गा जन्म-मरण-चक्र रूपी दुर्गनाशिनी हैं, आर्तों की पीड़ा का शमन करती हैं, कठिन, दुर्गम दुर्ग का भेदन करने वाली हैं, दुर्दैत्यों का संहार करनेवाली और सबकी परमेश्वरी हैं। जीवन में दुख-संकट भय आने पर माँ की इन नामों से आराधना, उपासना करने से अतुलनीय शक्ति का उद्भव होता है और मनुष्य उन समस्त संकटों को हँसते हुए पार हो जाता है।

महाशक्तिशालिनी हैं माँ दुर्गा

माँ के नाम-स्मरण मात्र से मानव के तन-मन में शक्ति आती है। ऐसा क्यों न हो? क्योंकि माँ दुर्गा महाशक्तिशालिनी हैं। माँ का प्राकट्य समस्त देवताओं के एक-एक अंश से उद्भूत शक्ति के सम्मिलन से हुआ है। अत: सर्वदेवशक्ति की सम्मिलित महाशक्ति हैं। देवासुर संग्राम में देव पराजित होकर दानवों से रक्षा हेतु माँ से प्रार्थना करते हैं, तब महाशक्तिरूपिणी माँ शुम्भ-निशुम्भ आदि दैत्यों का वध कर विजय प्राप्त करती हैं और देवों को सनाथ करती हैं। माँ दुर्गा को जब-जब देवों ने आर्त होकर पुकारा, तब-तब माँ ने आकर उनकी रक्षा की। माँ ने स्वयं यह प्रतिज्ञा की है –

इत्थं यदा यदा बाधा दानवोत्था भविष्यति।
तदा तदावतीर्याहं करिष्याम्यरिसंक्षयम्।।

– इस प्रकार जब-जब संसार में दानवी बाधा उपस्थित होगी, तब-तब अवतार लेकर मैं शत्रुओं का संहार करूँगी। इतना ही नहीं माँ देवताओं को आश्वस्त करते हुए कहती हैं —

एभि: स्तवैश्च मां नित्यं स्तोष्यते य: समाहित:।
तस्याहं सकलां बाधां नाशयिष्याम्यसंशयम्।।…
उपसर्गानशेषांस्तु महामारी समुद्भवान्।
तथा त्रिविधमुत्पातं माहात्म्यं शमयेन्मम।।

– जो एकाग्रचित्त होकर प्रतिदिन इन स्तुतियों से मेरा स्तवन करेगा, उसकी सारी बाधाएँ मैं निश्चय दूर करूँगी। जो मेरा माहात्म्य सुनेगा, उसके महामारीजनित सभी दुखों और त्रिविध दुखों का मैं शमन कर दूँगी। तभी तो स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती जी महाराज भव-भय नाश हेतु माँ दुर्गा की वन्दना करते हैं –
जय दुर्गे दुर्गति परिहारिणी शुम्भ विदारिणी मातु भवानी।।
आदिशक्ति परब्रह्मस्वरूपिणी जगजननि चहुँ वेद बखानी।।
ब्रह्मानन्द शरण में आये भवभय नाश करो महरानी।।

माँ के प्रति प्रेम कैसे बढ़े?

माता के उपकारों को स्मरण करने से उनके प्रति प्रेम बढ़ता है। त्रैलोक्यनाथ सान्याल कहते हैं —

अन्तरे जागिछो गो माँ अन्तरयामिनी।
कोले कोरो आछो मोरे दिवस यामिनी।।…

– अर्थात् ‘‘हे अन्तर्यामिनी माँ! तुम मेरे हृदय में जाग्रत हो। मुझे अर्हिनश अपनी गोद में ली हुई हो। हे माँ! इस अधम पुत्र के प्रति तुम्हारा इतना स्नेह! मानो तुम प्रेम में पगली हो गई हो। माँ! तुम कभी प्रेम से और कभी बलपूर्वक मुझे अमृत पिलाती हो और मधुर कहानियाँ सुनाती हो। मैं अब तेरी वाणी को सुनकर ही सन्मार्ग पर चलूँगा। तेरा दुग्ध पीकर वीर बलवान बनूँगा और आनन्द से जय ब्रह्म सनातनी के गीत गाऊँगा।’’ इस प्रकार माँ जगदम्बा की कृपा का अनुभव करने से, मन-ही-मन उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने से उनसे प्रेम और श्रद्धा बढ़ती है। इसी प्रेम और श्रद्धा की डोर से आकर्षित होकर माँ पुत्र को अपना दिव्य दर्शन देने और उसकी रक्षा करने के लिये दौड़ी चली आती हैं। माँ जगदम्बा सर्वरूपमयी हैं और सकल संसार देवीमय, देवी से परिपूर्ण है, इसलिये मैं उस विश्वरूपिणी परमेश्वरी को नमस्कार करता हूँ।

सर्वरूपमयी देवि सर्वं देवीमयं जगत्।
अतोऽहं विश्वरूपां त्वां नमामि परमेश्वरीम्।।

ऐसी परम सहृदया स्नेहवत्सला सुत-स्नेह में पागलिनी हमारी माँ दुर्गा हैं। माँ हम सबका परम कल्याण करें और अपना दिव्य दर्शन देकर हम सबको भवसागर से पार करें।

लेखक: स्वामी प्रपत्त्यानन्द1

  1. विवेक ज्योति, अक्टूबर 2016

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प्रश्न-चुप-साधन सुगमतापूर्वक कैसे होता है?
उत्तर-मेरेको बैठना है, चुप-साधन करना है-ऐसा संकल्प रहनेसे चुप-साधन बढ़िया नहीं होता; क्योंकि वृत्तिमें गर्भ रहता है। मेरेको कुछ नहीं करना है-यह भी ‘करना ही है। चुप-साधन बढ़िया तब होता है, जब कुछ करनेकी रुचि न रहे। जो देखना था, देख लिया; सुनना था, सुन लिया; बोलना था, बोल लिया। इस प्रकार कुछ भी देखने, सुनने, बोलने आदिकी रुचि न रहे। रुचि रहनेसे चुप-साधन बढ़िया नहीं होता।

प्रश्न-कुछ करनेकी रुचि न रहे तो सिद्धि हो गयी, फिर साधन कैसे होगा?
उत्तर-सिद्धि होनेपर रुचि नहीं रहती-इतनी ही बात नहीं है, प्रत्युत असत्की सत्ता ही उठ जाती है! न करनेकी रुचि रहती है, न नहीं करनेकी रुचि रहती है-‘नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन’ (गीता ३ । १८)। अतः रुचि न रहनेसे ही सिद्धि नहीं होती, प्रत्युत असत्की सत्ता न रहनेसे सिद्धि होती है। सर्वथा रुचि न मिटनेपर भी चुप-साधन हो सकता है।

प्रश्न-चुप-साधनमें बाधक क्या है?
उत्तर-पदार्थ और क्रियाका आकर्षण अर्थात् पदार्थकी आसक्ति और करनेका वेग चुप–साधनमें बाधक है।

प्रश्न-चुप-साधन और समाधिमें क्या अन्तर है?
उत्तर-चुप-साधन समाधिसे श्रेष्ठ है; क्योंकि इससे समाधिकी अपेक्षा शीघ्र तत्त्वप्राप्ति होती है। चुप-साधन स्वतः है, कृतिसाध्य नहीं है, पर समाधि कृतिसाध्य है। चुप होनेमें सब एक हो जाते हैं, पर समाधिमें सब एक नहीं होते। समाधिमें समय पाकर स्वतः व्युत्थान होता है, पर चुप-साधनमें व्युत्थान नहीं होता। चुप-साधनमें वृत्तिसे सम्बन्ध विच्छेद है, पर समाधिमें वृत्तिकी सहायता है।

प्रश्न-चुप-साधनमें चिन्तनकी उपेक्षा कौन करता है?
उत्तर–उपेक्षा स्वयं करता है, जो कर्ता है अर्थात् जिसमें कर्तृत्व है। सिद्ध होनेपर वह स्वभाव बन जाता है, उसका कर्तृत्व नहीं रहता।

प्रश्न-उपेक्षा अथवा साक्षीका भाव रहेगा तो बुद्धिमें ही?
उत्तर-भाव तो बुद्धिमें रहेगा, पर उसका परिणाम स्वयं (स्वरूप)में होगा; जैसे—युद्ध तो सेना करती है, पर विजय राजाकी होती है। उपेक्षासे, उदासीनतासे स्वयंका जड़तासे सम्बन्ध विच्छेद हो जाता है।

प्रश्न-जाग्रत्-सुषुप्तिके क्या लक्षण हैं?
उत्तर-जब न तो स्थूलशरीरकी ‘क्रिया’ हो, न सूक्ष्म-शरीरका ‘चिन्तन’ हो और न कारणशरीरकी ‘निद्रा’ तथा ‘बेहोशी’ हो, तब जाग्रत्-सुषुप्ति होती है। जाग्रत्-सुषुप्ति और चुप-साधन एक ही हैं। समाधिमें तो लय, विक्षेप, कषाय और रसास्वाद-ये चार दोष (विघ्न) रहते हैं, पर जाग्रत्-सुषुप्तिमें ये दोष नहीं रहते। ध्येय परमात्माका होनेसे जब साधककी वृत्तियाँ परमात्मामें लग जाती हैं, तब जाग्रत्-सुषुप्ति होती है। इसमें सुषुप्तिकी तरह बाह्य ज्ञान नहीं रहता, पर भीतरमें ज्ञानका विशेष प्रकाश(स्वरूपकी जागृति) रहता है।

श्रोत: प्रश्नोत्तरमणिमाला, स्वामी रामसुखदास

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याद रखो -काम, क्रोध, लोभ आदि तुम्हारे स्वभाव नहीं हैं, विकार हैं। स्वभाव या प्रकृतिका परिवर्तन बहुत कठिन है, असम्भव-सा है; पर विकारोंका नाश तो प्रयत्नसाध्य है। इसीलिये भगवान्ने गीतामें “ज्ञानी भी अपनी प्रकृतिके अनुसार चेष्टा करता है, प्रकृतिका निग्रह कोई क्या करेगा”–कहा है; पर साथ ही काम-क्रोध, लोभको आत्माका पतन करनेवाले और नरकोंके त्रिविध द्वार बतलाकर उन्हें त्याग करनेके लिये कहा है। इससे सिद्ध है कि ब्राह्मण-क्षत्रियादि प्रकृतिका त्याग बहुत ही कठिन है, पर काम-क्रोधादि विकारोंका त्याग कठिन नहीं है।

याद रखो -काम-क्रोधादि विकार तभीतक तुमपर अधिकार जमाये हुए हैं, जबतक इन्हें बलवान् मानकर तुमने निर्बलतापूर्वक इनकी अधीनता स्वीकार कर रखी है। जिस घड़ी तुम अपने स्वरूपको सँभालोगे और अपने नित्य-संगी परम सुहृद् भगवान्के अमोघ बलपर इन्हें ललकारोगे, उसी घड़ी ये तुम्हारे गुलाम बन जायँगे और जी छुड़ाकर भागनेका अवसर हूँढ़ने लगेंगे।

याद रखो -ये विकार तो दूर रहे, ये जिनमें अपना अड्डा जमाकर रहते हैं और जहाँ अपना साम्राज्य–विस्तार किया करते हैं, वे इन्द्रिय-मन भी तुम्हारे अनुचर हैं। तुम्हारी आज्ञाका अनुसरण करनेवाले हैं, पर तुमने उनको बड़ा प्रबल मानकर अपनेको उनका गुलाम बना रखा है, इसीसे वे तुम्हें इच्छानुसार नचाते और दुर्गतिके गर्तमें गिराते हैं।

याद रखो -जितने भी बुरे कर्म होते हैं, उनमें ये कामक्रोध आदि विकार ही प्रधान कारण हैं। ये ही तुम्हारे प्रबल शत्रु हैं, जिनको तुमने अपने अंदर बसा ही नहीं रखा है, बल्कि उनके पालन-पोषण और संरक्षणमें भ्रमवश तुम गौरव तथा सुखका अनुभव करते हो।

याद रखो -ये काम, क्रोध, लोभ और इनके साथीसंगी मान, अभिमान, दर्प, दम्भ, मोह, कपट, असत्य और हिंसा आदि दोष जबतक मानव-जीवनको कलुषित करते रहेंगे, तबतक उसका उद्धार होना अत्यन्त कठिन है; पर ये ऐसे प्रबल हैं कि प्रयत्न करनेपर भी सहजमें जाना नहीं चाहते !

याद रखो -ये कितने ही प्रबल क्यों न हों-आत्माके तथा भगवान्के बलके सामने इनका बल कोई भी स्थान नहीं रखता। जैसे सूर्याभाससे ही अन्धकारका नाश होने लगता है, वैसे ही भगवान्की शक्तिके प्रकाशका अरुणोदय इन्हें तत्काल नाश कर डालता है। उसके सामने ये खड़े भी नहीं रह सकते।

याद रखो -आत्मा तो तुम्हारा स्वरूप ही है और भगवान् उस आत्माके भी आत्मा हैं। आत्माके साथ उनकी सजातीयता तो है ही, एकात्मता भी है। अनुभूति होनेभरकी देर है, फिर तो इन विकारोंकी सत्ता वैसी ही रह जायगी, जैसी जागनेके बाद स्वप्नके पदार्थोकी रह जाती है।

श्रोत: गीता चिंतन, हनुमान प्रसाद पोद्दार

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प्राचीन समयकी बात है। दुर्गम नामका एक महान् दैत्य था। उसका जन्म हिरण्याक्षके कुलमें हुआ था तथा उसके पिताका नाम रुरु था। ‘देवताओंका बल वेद है। वेदके लुप्त हो जानेपर देवता भी नहीं रहेंगे’–ऐसा सोचकर दुर्गमने ब्रह्माजीसे वर पानेकी इच्छासे उनकी प्रसन्नताके लिये बड़ी कठोर तपस्या की। उसकी तपस्यासे प्रसन्न होकर ब्रह्माजीने उसे दर्शन दिया और उससे इच्छानुसार वर माँगनेके लिये कहा। दुर्गमने ब्रह्माजीसे कहा-‘पितामह! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मुझे सम्पूर्ण वेद देनेकी कृपा करें और देवताओंको परास्त करनेकी शक्ति भी दें।’

दुर्गमकी बात सुनकर चारों वेदोंके अधिष्ठाता ब्रह्माजी ‘ऐसा ही हो’ कहकर अपने लोक चले गये। इसके परिणामस्वरूप ब्राह्मणोंको समस्त वेद विस्मृत हो गये। स्नान, श्रद्धा, होम, श्राद्ध, यज्ञ और जप आदि वैदिक क्रियाएँ नष्ट हो गयीं। सारे संसारमें घोर अनर्थ उत्पन्न करनेवाली अत्यन्त भयंकर स्थिति हो गयी। देवताओंको हविका भाग मिलना बन्द हो गया, जिससे वे निर्बल हो गये। उसी समय उस भयंकर दैत्यने अपनी सेनाके साथ देवताओंकी पुरी अमरावतीको घेर लिया। दुर्गमका शरीर वज्रके समान कठोर था। देवता उसके साथ युद्ध करनेमें असमर्थ होनेके कारण भागकर गुफाओं में छिप गये और भगवतीकी आराधनामें समय बिताने लगे। अग्निमें हवन न होनेके कारण वर्षा भी बन्द हो गयी। पृथ्वीपर लोग एक-एक बूंद जलके लिये तरसने लगे। घोर अकाल और अनावृष्टिके कारण लोगों के प्राण संकटमें पड़ गये।

संसारको घोर संकटसे बचानेके लिये ब्राह्मणलोग हिमालयपर्वतपर गये और मनको एकाग्र करके पराम्बा भगवतीकी उपासना करने लगे। लोककल्याणके लिये तपस्यारत ब्राह्मणोंपर भगवती प्रसन्न हुईं। उन्होंने अनन्त आँखोंसे सम्पन्न दिव्य रूपमें उनको दर्शन दिया। भगवतीका वह विग्रह कज्जलके पर्वतकी तुलना कर रहा था। आँखें ऐसी थीं, मानो नीलकमल हों। कन्धे ऊपर उठे हुए थे। विशाल वक्षःस्थल था। हाथोंमें बाण, कमलके पुष्प, पल्लव और मूल सुशोभित थे। भगवतीने शाक आदि खाद्य पदार्थ तथा अनन्त रसवाले फल ले रखे थे। विशाल धनुष देवीकी शोभामें वृद्धि कर रहा था। सम्पूर्ण सुन्दरताका सारभूत देवीका वह रूप बड़ा कमनीय था। करोड़ों सूर्योके समान चमकनेवाला वह विग्रह करुणाका अथाह समुद्र था। करुणार्द्रहृदया भगवती अपनी अनन्त आँखोंसे सहस्रों जलधाराओंकी वृष्टि करने लगीं। उनके नेत्रोंसे निकले हुए जलसे नौ राततक घनघोर वृष्टि हुई। उस पवित्र जलसे सम्पूर्ण संसार तृप्त हो गया। नदी और समुद्रमें बाढ़ आ गयी। छिपकर रहनेवाले देवता अब बाहर निकल आये।

देवताओं और ब्राह्मणोंने भगवतीकी स्तुति करते हुए कहा-‘अपनी मायासे संसारकी संरचना करनेवाली, भक्तोंके लिये कल्पवृक्ष एवं लोककल्याणके लिये दिव्य विग्रह धारण करनेवाली भगवति ! तुम्हें कोटिशः प्रणाम है। तुमने सहस्रों नेत्रोंसे जलवृष्टि करके इस संसारका महान् कल्याण किया है। अतः तुम्हारा यह स्वरूप ‘शताक्षी’ नामसे विख्यात होगा। अम्बिके! हम सब भूखसे अत्यन्त पीड़ित हैं, अतः तुम्हारी विशेष स्तुति करनेमें असमर्थ हैं। भगवती शताक्षीने प्रसन्न होकर ब्राह्मणों एवं देवताओंको अपने हाथोंसे दिव्य फल एवं शाक खानेके लिये दिये तथा भाँति-भाँतिके अन्न भी उपस्थित कर दिये। पशुओंके खानेयोग्य कोमल एवं अनेक रसोंसे सम्पन्न नवीन तृण भी उन्हें देनेकी कृपा की और कहा कि मेरा एक नाम ‘शाकम्भरी’ भी पृथ्वीपर प्रसिद्ध होगा-शाकम्भरीति विख्यातिं तदा यास्याम्यहं भुवि। दुर्गाके स्वरूपमें भगवतीने वेदोंको दुर्गम नामक दैत्यसे छीनकर ब्राह्मणोंको देनेका आश्वासन भी दिया।

श्रोत: श्रीमार्कण्डेयमहापुराण1
  1. कल्याण, अक्टूबर 2015

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