प्रश्नोत्तरमणिमाला

१६. सात्त्विक सुख, शान्ति और आनन्दमें क्या फर्क है?
चिन्मयताके सम्बन्धसे (कीर्तन आदिमें) ‘सात्त्विक सुख’ मिलता है। सात्त्विक सुखका भोग न करनेसे ‘शान्ति’ मिलती है। शान्तिका भी उपभोग न करनेसे ‘आनन्द’ मिलता है। सात्त्विक सुखमें गुण हैं, शान्ति और आनन्द गुणातीत हैं। संसारके त्यागसे शान्ति और परमात्माकी प्राप्तिसे आनन्द मिलता है॥१६॥

१७. सांसारिक सुख और पारमार्थिक आनन्दमें क्या अन्तर है?
सांसारिक सुख दुःखकी अपेक्षासे है अर्थात् सांसारिक सुखके साथ दुःख भी है। परन्तु आनन्द निरपेक्ष है, उसके साथ दुःखका मिश्रण नहीं है। सांसारिक सुखमें विकार है, पर आनन्द निर्विकार है। सांसारिक सुख विषयेन्द्रिय-संयोगजन्य है, पर आनन्द संयोगजन्य नहीं है। अत: सांसारिक सुखमें तो भभका है, पर आनन्दमें भभका नहीं है, प्रत्युत वह सम, एकरस, शान्त, निर्विकार है। तात्पर्य है कि विकार, दुःख, परिवर्तन, कमी, हलचल, विक्षेप, विषमता, पक्षपात आदिका न होना ही ‘आनन्द’ है। आनन्द दो प्रकारका होता है, अखण्ड आनन्द (निजानन्द) और अनन्त आनन्द (परमानन्द)। मुक्तिका आनन्द ‘अखण्ड आनन्द’ और प्रेमका आनन्द ‘अनन्त आनन्द’ है। अखण्ड आनन्द सम, शान्त, एकरस रहता है और अनन्त आनन्द प्रतिक्षण वर्धमान होता है। अत: प्रेमका आनन्द मुक्तिके आनन्दसे वहुत विलक्षण है। मुक्तिमें तो केवल सांसारिक दुःख मिटता है और स्वयं वैसा-का-वैसा रहता है, पर प्रेममें स्वयंका अपने अंशी परमात्माकी ओर खिंचाव होता है। यदि साधक अपना आग्रह न रखे तो शान्तरस अखण्डरसमें और अखण्डरस अनन्तरसमें स्वत: लीन होता है॥१७॥

२०. कर्तव्यका पालन कठिन क्यों दीखता है?
कर्तव्य कहते ही उसे हैं, जिसे किया जा सके और जिसे करना चाहिये। जिसे नहीं कर सकते, वह कर्तव्य नहीं होता। अत: कर्तव्यका पालन सवसे सुगम है। अकर्तव्यकी आसक्तिके कारण ही कर्तव्य-पालन कठिन दीखता है॥२०॥

११०. क्रोध आनेपर क्या करना चाहिये?
चुप हो जाना चाहिये। वोलनेसे क्रोध बढ़ता है, चुप होनेसे क्रोध शान्त होता है। यदि बोले बिना रहा न जाय तो मुखमें ठण्डा जल भर ले और उसको कुछ देरतक मुखमें ही रखकर फिर धीरे-धीरे पी जाय। जलसे क्रोधरूपी अग्नि शान्त होती है। मूलमें क्रोध अहंकार और कामनासे पैदा होता है— ‘कामात्क्रोधोऽभिजायते’ (गीता २ । ६२)। जब अभिमानरूपी फोड़ेमें ठेस लगती है अथवा मनके विरुद्ध कोई बात होती है, तब क्रोध आता है। इसलिये अहंकार और कामनाका त्याग करना चाहिये। शरीर संसारका है और मैं भगवान्का हूँ। मैं शरीरसे सर्वथा अलग हूँ। इस प्रकार विवेककी प्रधानता होनेसे क्रोध नहीं आता। बड़ोंपर क्रोध आये तो उनके चरणोंमें गिर जाना चाहिये कि मुझे क्रोध आ गया ! सत्संग करनेसे स्वभाव सुधरता है और काम-क्रोधादि दोष कम होते हैं॥११०॥

१११. कामवृत्तिका नाश कैसे हो?
शरीरके साथ अपना सम्बन्ध माननेसे ही काम-वृत्ति पैदा होती है। हमारा स्वरूप सत्तामात्र है। सत्तामात्रकी तरफ वृत्ति रहनेसे कामवृत्तिका नाश हो जाता है। कारण कि सत्तामें विकार नहीं है और विकारमें सत्ता नहीं है। विचार करनेसे अथवा भगवान्से प्रार्थना करनेसे भी ‘काम’ से बचा जा सकता है। दृढ़ निश्चयसे भी ‘काम’ दूर जो जाता है; जैसे—पहले जमानेमें राजालोग ही नहीं, डाकू भी स्त्रियोंसे दुर्व्यवहार नहीं करते थे तो यह उनका दृढ़ निश्चय था। ‘काम’ नीरसतासे पैदा होता है। जैसे कुत्तेको मांस नहीं मिलता तो वह सूखी हड्डी ही चबाता है, जिससे उसके मुखसे खून निकलता है और वह उसीसे राजी हो जाता है ! ऐसे ही नीरसतामें मनुष्य देखता है कि कोई भी भोग मिल जाय तो थोड़ा सुख ले लें ! यदि भगवान्में प्रियता हो जाय तो नीरसता दूर हो जायगी और नीरसता दूर होनेसे ‘काम’ भी नहीं रहेगा॥१११॥

११७. धर्मका मूल क्या है?
स्वार्थका त्याग तथा दूसरोंका हित॥११७॥

११८. धर्मका प्रचार कैसे करें?
धर्मके अनुसार खुद चलें—इसके समान धर्मका प्रचार कोई नहीं है॥११८॥

२९९. विवेक किस उपायसे बढ़ता है?
अगर मनुष्य विवेकका आदर करे अर्थात् विवेक-विरुद्ध कार्य न करे तो उसका विवेक गुरु आदिकी सहायताके बिना स्वत: वढ़ जाता है। अगर वह जान-बूझकर न करनेलायक काम करेगा तो विवेक नहीं बढ़ेगा। विवेक-विरुद्ध कार्य करनेसे विवेकका बढ़ना रुक जाता है॥२९१॥

३१९. संसारका असर न पड़े-इसके लिये क्या करें?
संसारका असर मन-बुद्धि-इन्द्रियोंपर पड़ता है, अपनेपर नहीं—इस तरफ खयाल रखें। संसारका असर सदा रहेगा नहीं, मिट जायगा, इसलिये इसकी परवाह न करें। मैं अससे अलग हूँ—इस तरफ दृष्टि रखें तो उसकी जड़ कट जायगी। हम परमात्माके अंश हैं, इसलिये हमारा सम्बन्ध परमात्माके साथ है। संसारमें कोई भी वस्तु व्यक्तिगत नहीं है। शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि प्रकृतिके अंश हैं, इसलिये उनका सम्बन्ध प्रकृतिके साथ है, हमारे साथ नहीं॥३११॥

३२४. संसारका खिंचाव मिटानेका बढ़िया उपाय क्या है?
विषयोंका सेवन रागपूर्वक न करे, पर भजन रागपूर्वक (प्रेमपूर्वक) करे। विषयोंका सेवन करते समय, भोग भोगते समय हृदयको कठोर रखे अर्थात् भोगोंमें रस न ले, उनसे निर्लिप्त रहे। कारण कि जैसे पिघले हुए मोममें रंग डालनेसे रंग उसके भीतर बैठ जाता है, ऐसे ही हृदय द्रवित होनेपर वे विषय भीतर वैठ जाते हैं॥३२४॥

३४८. साधकका कर्तव्य क्या है?
साधकका कर्तव्य है—साध्यसे प्रेम करना और असाधनका त्याग करना। चाह-रहित होना साधन है और किसीसे कुछ भी चाहना असाधन है॥३४८॥

३४९. साधक अपनी लगन (भूख) कैसे बढ़ाये?
लगन विचारसे बढ़ती है। विचार करना चाहिये कि नाशवान् पदार्थोके साथ हम कबतक रहेंगे? ये वस्तुएँ और व्यक्ति हमारे साथ कबतक रहेंगे? इसी चालसे साधन चलेगा तो सिद्धि कव होगी? अबतक जितने समयमें जितना लाभ हुआ है, उसी गतिसे साधन करनेपर और कितना समय लगेगा? आगे जीवनका क्या भरोसा है? आदि-आदि॥३४९॥

३५०. साधकको विशेष ध्यान किसपर देना चाहिये, असाधनको हटानेपर अथवा जप, ध्यान आदि साधन करनेपर?
असाधनको हटानेपर विशेष ध्यान देना चाहिये। असाधन है—नाशवान्‌का सम्बन्ध। जप, ध्यान आदि साधन करनेसे साधक सन्तोष कर लेता है कि मैने इतना जप कर लिया, इतना ध्यान कर लिया, आदि। यह सन्तोष साधकके लिये वाधक होता है॥३५०॥

३५५. मनुष्यजीवनमें साधनका आरम्भ कबसे होता है?
जब मनुष्य संसारसे संतप्त हो जाता है और विचार करता है, तब साधन आरम्भ होता है। तात्पर्य है कि जव मनुष्यको संसारसे सुख नहीं मिलता, शान्ति नहीं मिलती, तव वह संसारसे निराश हो जाता है। उसके भीतर उथल-पुथल मचती है और यह विचार होता है कि मुझे वह सुख चाहिये, जिसमें दुःख न हो। वह जीवन चाहिये, जिसमें मृत्यु न हो। वह पद चाहिये, जिसमें पतन न हो। मैं नित्य सुखके विना नहीं रह सकता। ऐसा विचार होनेपर वह साधनमें लग जाता है॥३५५॥

३५६. हमारा साधन आगे बढ़ रहा है या नहीं, इसकी पहचान कैसे करें?
जितना संसारमें आकर्षण कम हुआ है और भगवान्में आकर्पण अधिक हुआ है, उतना ही हम साधनमें आगे वढ़े हैं। साधनमें आगे बढ़नेपर व्यवहारमें राग-द्वेष कम होते हैं। चित्तमें शान्ति, प्रसन्नता रहती है। सांसारिक लाभ-हानिमें हर्ष-शोक कम होते हैं॥३५६॥

३८०. महान् सुख मिले बिना अल्प सुखकी आसक्तिका त्याग कैसे होगा?
इसका उपाय है कि पारमार्थिक विपयम थोड़ा भी सुख मिले तो उसका आदर करे, उसपर विश्वास करे। जैसे सत्संग, कथा-कीर्तन आदिमें एक सुख मिलता है, जबकि वहाँ कोई भोग-पदार्थ नहीं होता, पर हम उसका आदर नहीं करते। अगर पारमार्थिक विषयमें थोड़ा भी सुख मिले और उसपर हम विश्वास करते रहें तथा सांसारिक सुखका विश्वास छोड़ते जायँ तो महान् सुखका अनुभव हो जायगा। वास्तवमें हमें न अल्प सुख लेना है, न महान् सुख लेना है ! लेना कुछ है ही नहीं !॥३८०॥

३८४. भोगोंके पुराने संस्कार पुन: भोगोंमें लगाते हैं, ऐसी स्थितिमें साधक क्या करे?
पुराने संस्कार इतने बाधक नहीं हैं, जितनी सुखलोलुपता बाधक है। सुखलोलुपता होनेसे ही संस्कार बाधक होते हैं। हम पुराने संस्कारोंसे सुख तो लेते हैं और चाहते हैँ कि संस्कार न आयें, तभी संस्कार हमें बाध्य करते हैं। अगर उनसे सुख न लें तो संस्कार मिट जायँगे, बाध्य नहीं करेंगे। कारण कि वास्तवमें संस्कारकी सत्ता ही नहीं है। उसको हम ही सत्ता देते हैं—भोगके समय भी हम ही भोगको सत्ता देते हैं। भोगोंसे सुख लेते हैं—इसीपर भोग टिके हैं। सुख न लें तो भोग हो ही नहीं सकता। सुख न लें तो विना मिटाये भोगका संस्कार स्वत: कमजोर पड़ जायगा। सुख लेनेसे पुराना संस्कार (नया भोग भोगनेके समान) नया होता रहता है। पुराने संस्कार आयें तो साधक उनकी उपेक्षा कर दे, न विरोध करे, न अनुमोदन करे। असत्का संस्कार भी असत् ही होता है। असत्की सत्ता है ही नहीं— ‘नासतो विद्यते भाव:’ (गीता २ । १६)॥३८४॥

३८५. निषिद्ध भोगकी आसक्तिसे कैसे छूटा जाय?
निषिद्ध भोगकी आसक्ति खराव स्वभावके कारण होती है। स्वभाव सुधरता है—सत्संग, सद्विचार, सच्छास्त्रके द्वारा विवेक जाग्रत् होनेपर अथवा भगवान्के शरणागत होनेपर। याद करनेसे पुराना भोग नया होता रहता है। याद करनेसे नया भोग भोगनेकी तरह ही अनर्थ होता है। कोई भोग भोगे साठ वर्ष हो गये, पर आज उसको याद किया तो आज नया भोग हो गया ! मनुष्य पुराने भोगको याद करके उसको नया करता रहता है, इसीलिये उसकी आसक्ति मिटती नहीं। इसलिये अगर पुराना भोग याद आ जाय तो उसमें रस (सुख) न ले। रस लेनेसे वह नया हो जाता है, उसको सत्ता मिल जाती है॥३८५॥

३८७. देशकी सेवा बड़ी है या माता-पिताकी सेवा?
माता-पिताकी सेवा एक नम्बरमें है और देशकी सेवा दो नम्बरमें। कारण कि हमें माता-पिताने शरीर दिया है, उसका पालन पोषण किया है, पढ़ा-लिखाकर योग्य वनाया है, इसलिये उनका हमारेपर ऋण है। पहले ऋण चुकाना चाहिये, फिर देशसेवा, दान आदि करना चाहिये। ऋण चुकाये बिना दान आदि करनेका अधिकार ही नहीं है॥३८७॥

३९०. सेवाधर्मको कठोर क्यों कहा गया है—‘सब तें सेवक धरमु कठोरा’(मानस, अयोध्या० २०३ । ४)?
सुख-आराममें आसक्ति होनेसे ही सेवा कठिन दीखती है— ‘सेवक सुख चह मान भिखारी’ (मानस, अरण्य० १७ । ८)। अपने सुख-आरामका त्याग करें तो सेवा कठिन नहीं है; क्योंकि सेवा करनेकी सव सामग्री संसारकी ही है, अपनी नहीं। उस सामग्रीको अपने सुखमें लगानेसे सेवा नहीं होती॥३९०॥

४१४. समाज-सुधारका उपाय क्या है?
अपने सुधारसे स्वतः समाज-सुधार होता है; क्योंकि व्यक्ति भी समाजका ही अंग है। व्यक्तिगत जीवन तो ठीक न हो, पर बातें बढ़िया कहें तो न अपना सुधार होगा, न समाजका। वेश्या यदि पातिव्रत्यका उपदेश दे तो वह कैसे लगेगा? अतः बातें बढ़िया नहीं, अपना जीवन बढ़िया होना चाहिये। समाज-सुधारकी चेष्टा न करके अपने सुधारकी चेष्टा करनी चाहिये। अपना सुधार होगा—स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके दूसरेका हित करनेसे॥४१४॥

श्रोत: प्रश्नोत्तरमणिमाला, स्वामी रामसुखदास

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